खत्रीनामा – सफर सदियों का, संघर्ष अपनों का...
प्रिय पाठक,
आपने अभी तक जिन अध्यायों में तथ्य, इतिहास
और गौरव पढ़ा है – वह केवल कल्पना या सुनी-सुनाई बात नहीं है, बल्कि
वर्षों की मेहनत और प्राचीन ग्रंथों से किए गए शोध का परिणाम है।हमने सीमित शब्दों
में आपके सामने वह सार रखा है, जो खत्री समाज
की असली पहचान और गौरव को उजागर करता है। यदि आप इस इतिहास को और गहराई से समझना
चाहते हैं, तो इस “खत्रीनामा – सफर सदियों का, संघर्ष अपनों
का” पुस्तक
को पूरा पढ़ें, ध्यानपूर्वक
पढे ।इसमें उन सभी प्राचीन पुस्तकों, तवारीखों और
प्रमाणिक ग्रंथों का उल्लेख है, जिनके आधार पर
यह ग्रंथ तैयार हुआ है। साथ ही हमारी वेबसाइट पर इन प्राचीन ग्रंथों की पीडीएफ भी
उपलब्ध हैं, जिन्हें पढ़कर आप स्वयं खत्री समज को
लेकर ओर अधिक शोध कर सकते हैं।
यह पुस्तक केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन है – जो
हमारे गौरवशाली अतीत से जुड़ने और उसे समझने की प्रेरणा देता है। लेखक हरीश पंकज
खरबन्दा ने इस
अभियान की शुरुआत अपने अनुभवों और समाज के प्रति समर्पण के साथ की, ताकि खत्री
समाज को फिर से एक संगठित,
सशक्त
और आत्मगौरव से भरा हुआ बनाया जा सके। देशभर में भ्रमण करते हुए उन्होंने खत्री
समाज के इतिहास, धार्मिक
आस्थाओं और सामाजिक योगदान को एकत्र किया – जिसमें मां हिंगलाज, मां भवानी और
गुरु साहिबान की प्रेरणा प्रमुख रही। इस पहल का उद्देश्य न केवल समाज को
उसकी जड़ों से जोड़ना है,
बल्कि
सामाजिक एकता, सहयोग
और उत्थान की भावना को भी प्रबल करना है – ताकि हर खत्री गर्व से कह सके, “हम खत्री हैं।”
खत्री समाज – इतिहास से वर्तमान तक
इतिहास कोई समाप्त यात्रा नहीं, यह सतत साधना है - संभव है कि इस पुस्तक में कुछ
त्रुटियाँ रह गई हों। परंतु हमारा संकल्प है कि आने वाले समय में आपके सुझाव, आपके अनुभव और आपकी नई जानकारी से यह यात्रा और सशक्त होगी। यह हमारी पहली पुस्तक जरूर है, लेकिन आख़िरी नहीं। आगे और भी पुस्तकें, डिजिटल कार्यक्रम और अभियान आपके सामने आएँगे, ताकि खत्री समाज का हर युवा अपने गौरवशाली इतिहास को जान सके और गर्व
से कह सके: “मैं खत्री हूँ, मैं भारत की
धरोहर हूँ!”
यह किताब केवल अक्षरों का भंडार नहीं है, यह हमारी रगों में बहता हुआ लहू है, हमारे पूर्वजों की हुंकार है, हमारी आत्मा की पुकार है। हमने जो कुछ लिखा है, वह प्राचीन ग्रंथों, अमर दस्तावेज़ों हमारे जन-जीवन से
लिया है। यह केवल जानकारी नहीं – यह वह रोशनी है, जो हर खत्री परिवार तक जानी चाहिए । अब हमें सांस्कृतिक आंदोलन करने
होंगे, डिजिटल मुहिम चलानी होगी। लेकिन इसके लिए हमें चाहिए – आपका हाथ, आपका जोश और आपका साथ। आप याद रखो कि – जो युवा अपने इतिहास को भूलता है, वह भविष्य की लड़ाई हार जाता है। लेकिन जो अपनी जड़ों को पहचान लेता
है, उसे कोई ताक़त झुका नहीं सकती। आओ, मिलकर एक दूसरे से यह वायदा करे कि हमें अपने समाज को बाँटना नहीं, जोड़ना है। हमें अपने गौरव को छुपाना नहीं, पुकारना है। अपनी पहचान को दबाना नहीं, बल्कि दुनिया के सामने ललकारना है।
आपके हाथ में खत्रीनामा सिर्फ़ एक किताब नहीं – यह आंदोलन है। यह शंखनाद है, यह बिगुल है, यह हुंकार है। और इसका असली अध्याय
अब आपकी कलम और आपके कर्म से लिखा जाएगा। आओ खत्रीनामा को अपना अस्त्र बनाकर इस समाज को फिर
से एकजुट करो। क्योंकि – “हम खत्री हैं – तलवार हमारी, कलम हमारी, और पहचान हमारी!”
“खत्रीनामा – सफ़र सदियों का, संघर्ष अपनों का।”
पंजाबी पुरुषार्थी सभा और पुरुषार्थ कोऑपरेटिव हाउस बिल्डिंग सोसायटी : संघर्ष से सफलता तक का गौरवशाली सफर
संघर्ष और संकल्प की नींव (1947–1957)
<p class="MsoNormal" style="mso-margin-top-alt:auto;mso-margin-bottom-alt:auto;
line-height:normal"><span lang="EN-US" style="font-size:12.0pt;font-family:"Times New Roman",serif;
mso-fareast-font-family:"Times New Roman"">1947 </span><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:"Mangal",serif;mso-ascii-font-family:"Times New Roman";
mso-fareast-font-family:"Times New Roman";mso-hansi-font-family:"Times New Roman"">में
भारत की आज़ादी और विभाजन के बाद जब हमारे पूर्वज हरियाणा के मेवात जिले के
पुन्हाना गाँव पहुँचे</span><span lang="EN-US" style="font-size:12.0pt;font-family:
"Times New Roman",serif;mso-fareast-font-family:"Times New Roman"">, </span><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:"Mangal",serif;mso-ascii-font-family:
"Times New Roman";mso-fareast-font-family:"Times New Roman";mso-hansi-font-family:
"Times New Roman"">तब हालात बेहद कठिन थे। जीवन-यापन के लिए उन्होंने बेलदारी की</span><span lang="EN-US" style="font-size:12.0pt;font-family:"Times New Roman",serif;
mso-fareast-font-family:"Times New Roman"">, </span><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:"Mangal",serif;mso-ascii-font-family:"Times New Roman";
mso-fareast-font-family:"Times New Roman";mso-hansi-font-family:"Times New Roman"">कपड़ों
के गट्ठर उठाकर गलियों में फेरी लगाई</span><span lang="EN-US" style="font-size:
12.0pt;font-family:"Times New Roman",serif;mso-fareast-font-family:"Times New Roman"">,
</span><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:"Mangal",serif;
mso-ascii-font-family:"Times New Roman";mso-fareast-font-family:"Times New Roman";
mso-hansi-font-family:"Times New Roman"">लेकिन हार नहीं मानी। यह दौर उनके साहस
और पुरुषार्थ का प्रतीक था।</span><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;
font-family:"Mangal",serif;mso-ascii-font-family:"Times New Roman";mso-fareast-font-family:
"Times New Roman";mso-hansi-font-family:"Times New Roman";mso-bidi-theme-font:
minor-bidi"> </span><span lang="EN-US" style="font-size:12.0pt;font-family:"Times New Roman",serif;
mso-fareast-font-family:"Times New Roman";mso-bidi-font-family:Mangal;
mso-bidi-theme-font:minor-bidi"><o:p></o:p></span></p>
<p class="MsoNormal" style="mso-margin-top-alt:auto;mso-margin-bottom-alt:auto;
line-height:normal"><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:"Mangal",serif;
mso-ascii-font-family:"Times New Roman";mso-fareast-font-family:"Times New Roman";
mso-hansi-font-family:"Times New Roman"">दस वर्षों के भीतर (</span><span lang="EN-US" style="font-size:12.0pt;font-family:"Times New Roman",serif;
mso-fareast-font-family:"Times New Roman"">1957 </span><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:"Mangal",serif;mso-ascii-font-family:"Times New Roman";
mso-fareast-font-family:"Times New Roman";mso-hansi-font-family:"Times New Roman"">में)
उन्होंने आपस में धन इकट्ठा कर लगभग </span><span lang="EN-US" style="font-size:
12.0pt;font-family:"Times New Roman",serif;mso-fareast-font-family:"Times New Roman"">8.5
</span><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:"Mangal",serif;
mso-ascii-font-family:"Times New Roman";mso-fareast-font-family:"Times New Roman";
mso-hansi-font-family:"Times New Roman"">एकड़ भूमि खरीदी और एक सुव्यवस्थित</span><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:"Times New Roman",serif;mso-fareast-font-family:
"Times New Roman""> </span><i><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:
"Mangal",serif;mso-ascii-font-family:"Times New Roman";mso-fareast-font-family:
"Times New Roman";mso-hansi-font-family:"Times New Roman"">पंजाबी कॉलोनी</span></i><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:"Times New Roman",serif;mso-fareast-font-family:
"Times New Roman""> </span><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:
"Mangal",serif;mso-ascii-font-family:"Times New Roman";mso-fareast-font-family:
"Times New Roman";mso-hansi-font-family:"Times New Roman"">बसाई। यह कॉलोनी उस
समय की आधुनिकतम सुविधाओं से परिपूर्ण थी और आज भी पूरे मेवात में अपनी तरह की
सबसे विकसित कॉलोनी मानी जाती है। इस दूरदर्शिता का परिणाम यह है कि आज (</span><span lang="EN-US" style="font-size:12.0pt;font-family:"Times New Roman",serif;
mso-fareast-font-family:"Times New Roman"">2024 </span><span lang="HI" style="font-size:12.0pt;font-family:"Mangal",serif;mso-ascii-font-family:"Times New Roman";
mso-fareast-font-family:"Times New Roman";mso-hansi-font-family:"Times New Roman"">में)
यहाँ की ज़मीन की कीमत महानगर गुरुग्राम के बराबर है।</span><span lang="EN-US" style="font-size:12.0pt;font-family:"Times New Roman",serif;mso-fareast-font-family:
"Times New Roman""><o:p></o:p></span></p>
✦ ✦ पुरुषार्थी पुन्हाना कोऑपरेटिव हाउस बिल्डिंग सोसायटी (1957)
1957 में रजिस्टर्ड पुरुषार्थी पुन्हाना कोऑपरेटिव हाउस बिल्डिंग सोसायटी ने समाज को एकजुट किया। चौड़ी सड़कों, व्यवसायिक भवनों और आवासीय सुविधाओं ने पुन्हाना को नई पहचान दी।
इस सोसायटी के प्रथम प्रधान घनश्याम दास जी रहे। उनके साथ लाला भगवान दास मेहता जी, गोवर्धन दास छाबड़ा जी, दौलत राम मेहता जी, गणेश दास जी, लालचंद जी, पुजारी लाल जी, भोपाल राम जी, नंदलाल कुमार जी, हिम्मत राम खरबंदा जी, राम सिंह कुमार जी, ऋषि छाबड़ा जी , भगवान दास पाहूजा जी, प्रेमचंद सिधानी जी, लेखराज चावला जी, आत्मप्रकाश सचदेवा जी, वीरभान जी, झांगी राम जी, उधो दास जी, गोपाल दास जी, मोहनलाल खरबंदा जी, मास्टर लक्ष्मण दास जी, शांति कुमार ठेकेदार जी आदि महान विभूतियों ने अथक परिश्रम कर इस संस्था को ऊँचाई दी।
यही वह पीढ़ी थी जिसने न केवल कॉलोनी को बनाया बल्कि सामाजिक और राजनीतिक पहचान भी बनाई। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में खत्री समाज से दो बार सरपंच चुने गए – लाला भगवान दास मेहता और उनकी पुत्री चंद्रकला खरबंदा। साथ ही घनश्याम दास कुमार नगरपालिका चेयरमैन बने और समाज का नाम रोशन किया।
✦ ✦ पंजाबी पुरुषार्थी सभा (2001)
करीब 50 साल बाद अगली पीढ़ी ने यह महसूस किया कि समाज के उत्थान के लिए संगठन और कोष आवश्यक है। इसी सोच से 2001 में पंजाबी पुरुषार्थी सभा की स्थापना हुई।
सभा का उद्देश्य सिर्फ पुन्हाना ही नहीं, बल्कि हरियाणा और पूरे देश में खत्री समाज की अलग पहचान बनाना था।
2007 से इसकी शाखाएँ देशभर में स्थापित की गईं और लगभग 15 वर्षों की मेहनत के बाद यह संस्था आज मजबूत स्तंभ बन चुकी है। आज गर्व से कहा जा सकता है कि सभा के पास करीब 50 करोड़ रुपए की संपत्ति है और यह पूरी तरह अपने बलबूते पर खड़ी है – बिना किसी चंदे के।
✦ ✦ वर्तमान नेतृत्व और योगदान
आज संस्था के संचालन में बसंत पाहुजा, आत्म प्रकाश कुमार, हरीश पंकज खरबंदा, हेमन्द्र चावला, अशोक मेहता, बालकिशन कुमार, अशोक मास्टर, दिनेश आहूजा, संजय कुमार पार्षद, नीरज छाबड़ा, महेश कुमार सिन्धानी, बालकिशन मल्होत्रा, इशान टुटेजा, पवन कुमार सहित कई सदस्य जी-जान से जुड़े हुए हैं। संस्था आज मार्केट, मंदिर, गुरुद्वारा, बारातघर और सामुदायिक गतिविधियों का संचालन दक्षता से कर रही है।
✦ ✦ निष्कर्ष – पुरुषार्थ की विरासत
यह गाथा सिर्फ जमीन खरीदने या इमारतें बनाने की नहीं है, बल्कि यह कहानी है संघर्ष से संकल्प और संकल्प से सफलता तक की।
1957 में जिस मशाल को हमारे बुजुर्गों ने जलाया, 2001 में उसे संगठन का स्वरूप मिला और आज यह मशाल समाज की एकता, प्रगति और गौरव का प्रतीक बन चुकी है।
“पुरुषार्थी” नाम ही इस बात का प्रतीक है कि हमारे पूर्वजों ने कठिनाइयों से लड़कर भविष्य को संवारने का सपना देखा और आज हम उसी नींव पर खड़े होकर और आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं।
गर्व करें कि हमारी नई पीढ़ी दुनिया में कीर्तिमान स्थापित कर रही है।
गर्व से कहो – हम खत्री हैं!
खत्रीनामा : हमारे प्रयास, सकारात्मक बदलाव
हमारा अगला अभियान आपकी भागीदारी से ही सफल हो सकता है।
हमारी गैलरी हर तस्वीर, एक कहानी
हर तस्वीर एक नई उम्मीद का प्रतीक है।