“90% खत्रियों को यह नहीं पता , की हमारी असली पहचान क्या है…” कोई खत्री लिख रहा है “कोई पंजाबी … कोई अरोरा…कोई सिन्धी ...कोई कुछ और…” यह ग्रन्थ हमारे बुजुर्गो के 1890 में अपनी असली पहचान के लिए किये गए 15 साल के संघर्ष और उनकी जीत के बारे में पूरी जानकारी देता है
खत्रीनामा ग्रंथ क्यों लिखा गया
“ यह ग्रंथ इसलिए नहीं लिखा कि एक और किताब छप जाए, इसे इसलिए लिखा कि कहीं हम ख़ुद न मिट जाएँ।”
हमने यह ग्रंथ तब लिखना शुरू किया, जब मैंने महसूस किया कि हमारे बच्चों को अपने पुरखों के नाम उनके संघर्ष, सोच और योगदान का पूर्णज्ञान होना चाहिए जो उनको नहीं है।
आज के युवा को इससे क्या मिलेगा?
“यह किताब युवाओं को पीछे नहीं ले जाती, यह उन्हें मज़बूत बनाकर आगे भेजती है।”
• पहचान — मैं कौन हूँ, मेरी जड़ें क्या हैं • आत्मविश्वास — मेरे समाज ने कठिन समय देखे हैं • दृष्टि — सिर्फ़ कमाने की नहीं, समाज बनाने की
• संतुलन — आधुनिकता और संस्कार के बीच
“खत्रिनामा ग्रंथ” किसी एक व्यक्ति की मेहनत नहीं, यह एक समाज की स्मृति है।
हमारा आग्रह है —इसे किताब समझकर मत देखिए, इसे संवाद की शुरुआत समझिए।आज अगर हमने अपनी कहानी नहीं संभाली, तो आने वाली पीढ़ी हमसे सिर्फ़ एक सवाल पूछेगी:
“आपके पास सब कुछ था,
फिर आपने हमें अपनी पहचान क्यों नहीं दी?”